सपनों की
शहादत
दिमाग
के अन्धेरे
कोने में
मेरी
बिखरी अस्मिता
के बीच
कुछ
सपने
शहीद
होने वाले
सिपाहियों की
तरह
चढे
जा रहे
हैं
कुछ
रुक गए
हैं
कुछ
उस अन्धेरे
में मिल
गए हैं
दिमाग
की इस
बेबसी पर
दिल…
पहूँचे
हुए ज्ञानी
की तरह
मुस्का
कर
कह
रहा है
“ग़म
किस बात
का है?
ये
छोटे लोगों
के सपने
हैं
शहीद
होना तो
इनका धर्म
है
निभाने
दो इनको”
दिशाहीनता
अपने
परिवार की
तपती आत्माओं
को
अपनी
दिशाहीन नाव
में लिए
किसी
किनारे की
तलाश में
चला
जा रहा
था मैं,
अनिश्चित सा
फिर
तू आया
तेरे
वादों में
एक सहारा
नज़र आया
राहत
की उम्मीद
में
सोंप
दी मैं
ने नाव
अपनी तुमको
और
बहलाए दिल
को लिए
बैठ
गया
निर्विवाद,
निश्चेष्ट, निष्क्रीय
फिर
मझधार में
देखा तो
तू
नहीं था
किसी
बड़े जहाज़
को चलाने
में
तू
व्यस्त था
सीने
में सिकुड़ते
दिल को
एहसास हुआ
बदबुदार
थे तेरे
वादे, पर…
तुम
से निराशा
के सिवा
कुछ और
भी मिला
इतना
अनुभव तो
मिल ही
गया
कि
मैं बड़ा
हुआ
इतना
बड़ा कि
मैं समझ
सकूँ
सरकार
राजनीतिज्ञों को
सोंपने
की वस्तु
नहीं
बापू
के
संदेश
हे
बपू!
देते
है रोज़,
कपबोर्ड
पर बैठे,
आपके
बन्दर,
कुछ
संदेश
सतयुग
के⃓
फिर
भी,
बज
जाते है
कान मेरे
बच्चों,
स्त्रियों, निर्दोशों
के
फटते
जिस्मों के
धमाकों से⃓
लाशों
के बीच,
निरंतर
चलते,
बन्दूकों
के शोर
से⃓
धुन्धली
पड़ जाती
है आँखें
मेरी
माक्डोनल्ड
के सामने
कराह्ते
भिखारी की
भूख
पर⃓
सीना
ताने
ऊँची
– ऊँची इमारतों
से
कुछ
ही दूर
बरसात
के आतिथ्य
को स्वीकारते
बेछत
आशियानों पर⃓
और
गालियाँ भी
निकल
जाती हैं
बार
बार मुख
से मेरी
कभी
मुखौटों की
आढ़ में,
कभी
सरे आम,
चारों
ओर से
बंधे
संघर्ष्रत
लोगों को
लूटते
नेताओं पर⃓
हिंसा
ये प्रत्यक्ष
– अप्रत्यक्ष
कब
तक चलेगा!
चिन्तन
मनन करके
थक
गया मैं⃓
अब
आप ही
बताइए बापू…
कैसे
सुनेगा
कलियुग
का पशुश्रेष्ठ
सतयुग
के बन्दरों
की!
कभी
मन हुआ
कि
आप
ही आ
जाएँ
फिर
से राह
दिखाएँ⃓
परन्तु
कैसे
स्वीकारेगा वह
जिसका
अस्तित्व ही
सत्य
और झूठ
के बीच
झूल
झूल कर
मिथ्या
बन गया
है,
आपके
सत्य को⃓
कैसे
अप्नाएगा वह,
जिसके
लिए
ख्याति,
जाति, नीति
हर
बहाना
बन
गया जायज़
हिंसा
हेतु,
आपके
अहिंसा को⃓
मुझ
लघु मानव
की
लघु
दृष्टि में
तो
अच्छा
है बापू
कि आप
फिर
नहीं आते⃓
आप
फिर आएँगे
तो
आज का
मनव
अपने
घर बलाएगा,
आपका
स्वागत करेगा,
खिलाएगा,
पिलाएगा,
आपके
संदेशों को
भी सुनेगा
और
फिर उनपर…
हँस
देगा
खिलखिलाकर⃓
जड़ है मुझमें कुछ
मिट्टी से खून मिल गया
खून से आँसु
और दिखती एक धुँधली
काया सी है
उस पेड़ की जड़ें
कसा है जो बरसों से
दुनियादारी के लतपथ हाथों में
उसके झंझावात के
प्रतिरोध में
झुक गयी है डलियाँ
बदल गया है रंग पत्तों का
अब फल फूल भी
कुछ और ही लगते हैं
हवा कुछ और मिलती है
पानी कुछ और मिलता है
पर याद है
पर याद है मुझे आज भी
मैं कौन हूँ
कहाँ से आया हूँ
ज्ञात है मुझे
रहा है मुझमें कुछ
अविच्छिन्न हमेशा से
जड़ है मुझमें कुछ
आज भी
बचत
वेतन मिलता है माहांत में
तो सांस ले लेता हूँम
कुछ पैसे किसी किताब में
कुछ अलमारी में पड़ी
किसी पुरानी कमीज़ में
रख देता हूँ
छुपा लेता हूँ
चोर की भांति
नहीं खरीदता
लिक्विड या पीस के कपड़े
मुँह में आए पानी को पीकर
गुज़र जाता हूँ
मेक्डोनल्ड के सामने
पता भी नहीं चला था
कबसे बन गया दिमाग मेरा अर्थशास्त्री
लगा लेता है जो
कीमत मन की हर इच्छा की
पर बचा नहीं पाता मुझको
उस बड़े अर्थशास्त्री
की साज़िशों से
हर दूसरे तीसरे सप्ताह
झार लेता हूँ
हर कमीज़ की जेब
छाँट लेता हूँ हर किताब
और हर बार
मेरा खाली बटवा
अपना बड़ा सा मुँह खोले
मेरा मज़ाक उड़ाता है!