शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

विश्व हिंदी सचिवालय कार्यशाला - ‘वेब डिजाइनिंग’ (विवरण : अर्विंदसिंह नेकित्सिंह)




आज गुरुवार २६ अपैल २०१२ को विश्व हिंदी सचिवालय द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय संगोष्ठी तथा कार्यशाला, जो २३ से २७ अप्रैल २०१२ तक रजीव गांधी साइंस सेंटर में चल रही है का चौथा दिन था.  प्रथम दिवस की संगोष्ठी के पश्चात, द्वितीय दिन को कार्यशाला का आरम्भ हुआ जिसमें विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को हिंदी में टंकण की विधियाँ, सोफ्ट्वेयर और उनके अधिष्ठापन विधियों को समझाने के पश्चात, दूसरे दिन ब्लॉग तथा ब्लॉगिंग कराना सिखाया गया.  साथ ही साथ प्रतिभगियों को टोलियों में विभाजित किया गया ताकि कार्य अधिक सुगम हो  जए.

प्रथम  कार्यशाला से ही सभी के बीच उतसुक्ता की लहर उमड़ने लगी. सभी जुट गए कुछ लिखने, कुछ बनाने में.  इन दृश्यों को देख सचिवालय के उप महासचिव श्री गुलशन सुखलाल के शब्द कुछ इस प्रकार थे “ आनंद आ गया, ऐसा लगा कि हम ‘तारे ज़मीन पर’ के अंतिम दृश्य को देख रहे है.”

कार्यक्रम का तीसरा दिन दूसरे दिवस का ही सेतु के रूप था. पिछले दिनोँके ज्ञान को और विस्तृत करने का प्रयास किया गय. कार्यशाला का आरम्भ प्रतिभगियोँ को फेस्बुक से परिचइत करने में हुआ. इस सत्र में श्री ललित कुमार ने इस ‘वेब पेज’ की यथा सम्भव व्याख्या की.  फिर उन्होंने प्रश्नोत्तर द्वारा प्रतिभागियों की शंकाओं को दूर किया.

इस के बाद बालेंदू जी ने अपनी अनोखी शैली में एक अन्य दिलचस्प विषय ‘वेब डिजाइनिंग’ प्रस्तुत किया.  उन्होंने प्रतिभागियों के इस भ्रम को मिटाया कि ‘वेब डिजाइनिंग’ एक कठिन कार्य है. पहले तो उन्होंने सिखाया कि कैसे ‘ऑफ्लाइन’ ही एक वेब पेज बनाया जा सकता है.  फिर अपने स्वनिर्मित सॉफ्ट्वेयर ‘वेब समर्थ’ के माध्यम से सभी का मन मोह लिया जब कुछ मिनटों में ही उन्होंने एक ‘वेब साइट’ का निर्माण कर अन्तर्जाल पर उसे प्रकाशित कर दिया. 
सारांश में आज का दिन भी ज्ञानप्रद रहा.


गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

हिन्दी की नई उड़ान (अब शुरु हुई है)





























सलिल ..................../

विनय गुदारी


अधूरा गीत

एक  गीत लिखना  चाहूँ 
जहाँ  शब्द  बने  तेरी  मुस्कान
जहाँ  लय  बने  हमारा  प्यार
जहाँ  तुकबंदी  करे  हमारी  जान
जहाँ  शामिल  हो  हमारा  संसार
अधुरा  ही  है  वो  गीत
जिसमें  है  एहसास  का  संगीत

है  जिसमे  तू 
ए मेरे  प्रीत
 
मगर  है  कम  एक  तारा
जो  न  बन  पाए 
मेरे  गीत  का  अन्तरा

विनय गुदारी 

गुल्शन सुखलाल




पासवर्ड

सुबह जब जागा
  तो मोबाईल को चार्ज पर से निकाला और
   ऑन करने के लिए कोड डाला
    तैयार होकर ऑफिस पहुँचा
     वहाँ दर्वाज़े का कोड डालकर लाल बत्ति हरी की
      फिर कम्प्यूटर ने मांगा अपना पासवर्ड
       और जब पैसे निकालने ए.टी.एम तक पहुँचा
        तो एक और…
                 कोड...
दिन भर के कामों को अनलॉक करता हुआ
  जब शाम को घर पहुँचा
   तो सीधे बिस्तर पर क्रैश हो गया
    पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदार तो एंटर कर नहीं पाए
     बीवी, बच्चों, माता पिता को भी मेरी दुनिया में
      एक्सैस मिला नहीं...

ज़िन्दगी में बेमानी हो चली
  कुछ भावनाओं, नर्मियों को
   दिल के जिस फोलडर में रखा था
    उसका पासवर्ड...
     मैं कहीं भूल गया।



गुलशन
07/06/07 

कुमुदिनी


धन्यवाद की फेहरिस्त लम्बी है... किसे पह्ले  धन्यवाद दूं सभी जिम्मेवार हैं मेरे सपने को पूरा करने में !
कोटिश:  धन्यवाद.... गुलशन जी आपको और सुश्री पूनम जी, पूर्णिमा जी , ललित जी  एवं बालेंदु जी को भी.
जैसा कि मैंने पहले भी कहा था “वेब साईट” बनाना मेरे लिए सपना ही नहीं आवश्यकता भी थी.
जी हाँ अब मैं गुनगुना सकती हूँ “ सच हुए सपने मेरे... “
 कम्प्युटर से संबंधित कई परेशानियों का हल मुझे मिला.. दिशा मिली , मार्गदर्शक मिले , सहायता मिली, उत्साह और प्रेरणा भी मिली.
 आशा ही नहीं विश्वास भी है कि हिंदी के प्रचार-प्रसार में इस कार्यशाला में सीखी गयी हर चीज़                          सहायक होगी.
आगे बढ़ने,सीखने सिखाने का यह सिलसिला सतत चलता रहे ईश्वर से यही विनय है !! 

 सदैव आभारी ,

 कुमुदिनी


अंजली हजगैबी


                      जीवन की गगरी

जीवन की गगरी में
लाखों स्वप्नों के बोझ को
छाती पर लादे
एक-एक करके विसर्जित कर देना पड़ता उन्हें
कमियों के सागर में
अजगर सी ज़रूरतें निगल लेती
                इन कोमल स्वप्नों को।

रोज़मर्रा के जीवन में
कमियां जब आदतें बन जाती है
तो ज़रूरतों का महत्व भी नहीं रहता
कमियों के संसार में
जीवित रह पाना ही बड़ी बात है।

बिना मक्खन की सूखी रोटी
गले को ज़ख्मी करते हुए,
काली चाय की कड़ुआहट
सीने को ऎंठती हुई..
पेट तक का रास्ता ढूंढ ही लेती।
शाम ढलते ही मज़दूरी करके
मां जब निराशा को झोली में संजोए
घर लौट आती
तो पेट की आग समझौता कर लेती
गीली भात,
उबले कच्चे पपीते की फीकी तरकारी से।

मार्केट में सबसे महेंगी चीज़ को देखते हुए
सबसे सस्ती चीज़ खरीद लाना...
खुद को समझा लेना पड़ता कि
चीज़ें महेंगी हो गई है
आदमी का जीवन सस्ता...

हाथ में हलका बटुआ लिए
इच्छाओं की मण्डी में घूमकर
अपना ही उपहास कर लेती कभी-कभार

अठन्नी-एक रुपया जोड़
एक जेब में उसकी खनक
तो दूसरी जेब में मायूसी की शान्त चीख ढोते हुए
स्कूल से युनिवर्सिटी तक का सफ़र तो काट लिया।
पर लक्ष्य के बस स्टाप पर उतरते ही
पता चला कि मंजिल के भी पैर निकल आए।

जीष्णु हरिशरण


                "एक बच्चे को"

आज,
न चाहकर भी देख आया मैं,
स्कूल से लौटते हुए एक बच्चे को,
फटे उसके गंदे जूतों को,
पुराने कमीज़ के असाधारण रंग-बिरंगे बटनों को,
पतलून के ज़िप पर लगे पिन को,
मैले रंगहीन बसते को,
देख आया मैं|
आँखों में उसके देखा,
एक ओर थकान था,
तो दूसरी ओर ख़ुशी,
एक ओर व्यस्तता थी,
तो दूसरी ओर शांति,
एक ओर दारिद्रता थी,
तो दूसरी ओर पूर्ती|
तब एकाएक,
दिल से दुआएँ निकलीं,
प्रार्थनाएँ निकलीं,
दुःख हुआ, पर ख़ुशी भी मिली|
कि अच्छा है-
संघर्ष है,
सपने हैं,
आशाएँ हैं...
मंजिल भी मिल जाएगी|
पर, हे प्रभु
इन छोटी-छोटी मासूम आँखों को,
धोखा मत देना|
देर ही सही,
इन नन्हे पैरों को,
अपनी मंजिल तक पंहुचा देना|
लेकिन,
इतना भी सहायक न बन जाना,
कि, ये ही पद,
एक दिन,
दूसरों को कुचल कर आगे बढ़ जाए|
इसलिए,
इन्हें नियंत्रित रखना,
मार्ग दिखाना,
ठोकर देना,
आँचल भी देना|
आज,
न चाहकर भी,
देख आया मैं,
स्कूल से लौटते हुए एक बच्चे को|

जीष्णु














संध्या नवोसा (कहानी)


“वीणवाँ के माँ”

शाम ढल रही थी। धीरे-धीरे सारा आकाश अंधकार के गर्त में जा रहा था। खिड़की हल्की सी खुली थी और उससे आती हवा के कारण कोने के पर्दे सरसरा रहे थे। बाहर से बच्चों के खिलखिलाने की आवाज़ के साथ ही पंछियों के झुण्ड के चहचहाहट सुनाई पड़ रही थी। ईश्वर पक्षियों को दाने देते हुए बच्चों को वहाँ से हटने के लिए कह रहा था। बच्चे हैं कि चिड़ियों को उड़ने में ही मज़ा ले रहे थे और दादा को परेशान किये जा रहे थे।

केसरी अपने बूढ़ी आँखों से एकटक आसमान को निहार रही थी। दोपहर की चाय के बाद, घण्टों वहीँ आर्मचैर पर बैठे शाम हो गई थी। बच्चे एक-एक कर स्कूल से लौट कर बड़ी दादी से मिलने आए थे और बाहर खेलने चले गए। “हमरा बड़ी माया लगता तोहरा देख के, देख आज कोन हाल होता तोर, कोन करनी करले बीणवाँ के मो, अभी तोर दसा देख, घर-बार बेचके केकर आसरा में हवे।” देवरानी के ये वाक्य अभी भी केसरी के कानों में गूंज रहे थे। वह मन ही मन अपने अस्तित्व को कोस रही थी। “हम का करली भगवान, कोन पाप करली। कहाँ चूक गयली? ”

खिड़की से खाली नीला आसमान स्पष्ट दिखाई दे रहा था, जिसमें कहीं भी बादल का एक टुकड़ा भी उड़ते नज़र न आया था। हाँ धुंधली आँखों से कभी पक्षियों का झुण्ड गुज़रते दिख जाता था। इतनी शून्यता, इतना खालीपन, उसके के मन में विचार आया।

अस्सी वर्ष के अनुभव तथा बीते दिनों की स्मृतियों के किस कण में थी वह उससे स्वयं अभिंज्ञ थी। कब पूरे कमड़े में अधेंरा छा गया, उसे मालूम न पड़ा। तभी बहू ने आकर आवाज़ दी - “माँ चीरागवा बार देय, आवऽ होने बैठऽ, भोजन लगभग तैयार बा।” इस मधुर बोली को सून वीणा की माँ एकाएक यथार्त में आ पहुँची। उसे याद आया इसी बहू को जब पहली बार वह बेटे के लिए पसंद करने गयी थी तो उसके आँगन में थूक कर आयी थी। कारण इतनी सी कि बेटा उसका गोरा चित्था और बहू इतनी काली। यहाँ तक कि उसकी माँ से साफ़-साफ़ कह आई थी कि अपनी बेटी के लिए उसी के रंग का दूल्हा ढूँढ ले। इस तरह के दाव-पेच न करे वह उन लागों को कभी सफल नहीं होने देगीं।

आज जब वह स्वयं दूसरों पर इतनी आधीन हो गई है तो यही बहू बच्चे के समान उसका खयाल रखती है। पैरों में अब उतनी शक्ति न रही कि बिना सहारे के वह चल पाए। आजकल बहू ही उसे कमड़े से रसोई, शौचालय, आदि तक ले जाती है, निश्चित समय पर सास को नहाना, खाना देना, यहाँ तक कि दिन में वह घर में बोर हो जाती तो उसे कुछ समय आँगन में भी घूमा लाती है। सास मन ही मन सोचती और हैरान होती इतना सब कुछ वह भी इतनी निःस्वार्थ भावना से।
बहू पास आई और बरे प्यार से माँ को उठाया, धीरे-धीरे माँ को ड्राविंग हाल में ले गयी। “माँ बैठऽ, सन्ध्या बार के आयला” तभी टीवी पर ‘सास भी कभी बहू थी’ सिरियल शुरू हुई। माँ देख रही थी तुलसी की तीन बहुएँ उसे पागल साबीत करके पागलखाना भेज चुकी थी। माँ ने सोचा कि बेचारी कितनी अच्छी थी पर पता नहीं किस पाप का भुगतान कर रही है। इसी के साथ वह अपने जीवन के बारे में सोचकर अपने भाग्य को फिर कोसने लगी। सोफ़े पर बैठी वह बगल के रसोई घर में भोजन पड़ोस रही बहू को देख सोचने लगी कि कहाँ से बहू ने इतनी सहनशक्ति पाई।

जब बेटा शादी करके बहु को घर लाया तो सास ने बहू को तंग करने का हर उपाय आज़माया। पानी भरके आई थी तो सीर पर ओढ़नी न थी, पता नहीं क्या गुल खिलाती हैं एक बाल्टी पानी लाने में घण्टों लग जाते हैं। माँ के घर से आती है तो घर का सारा काम छोड़कर बैठी रहती है, पता नहीं किस सोच में पड़ी रहती है। इसके हाथ का पकाया तो भले मानस को भी बीमार कर दे। हर स्थिति में एक ही  ताना था – “ई काली माई जाने कोंची जनेगी।” ईश्वर से जब कुछ और न बन पाता तो क्रोध मे आकर पत्नी को खूब मारता। बहू की सिसकियाँ सुन केसरी को एक अद्भुत आनन्द का अहसास होता। जिस बेटे से उसे कभी लगाव  न था, पत्नी पर उसका प्रेम देख केसरी को मन ही मन ग्लानी होती थी।

एकाएक बहू को सामने पाकर माँ चकित हो गई – “माँ गरम पानी आनी ला, तगले भोजन करऽ।” केसरी को तब वीणा के वाक्य याद आ गए – “जाके गरम कर ले, अब का चाहीं ला तोके सब हाथ पर देय के” वीणा गुस्से से उठी थी और गरम पानी लाकर बोली थी – “हेले तोर पानी, नय त रात के तोर खोंकी हमरा सूते नय देय।” और फिर पति की ओर देखते हुए व्यंग्य भरे शब्दों में कहा था – “ला-रेंन बनल हवन न, अब त इनकरे सेवा में दिन जाय। घर में रांस लगी त तनी अंगना घूमी, त बखत-बखत पर पानी आन, त चा पियेके मन बा।”

एक दिन जब माँ से रहा ना गया तो उसने साफ कह दिया था, “ देख लयका तोर से नय होत बा तऽ हमरा डालदे कुवां में, एक गिलास गरम पनियाँ खातिन काहे एतना बात सुना देवेले।” “भगवान करे ऐसन दिन देखे से आगे तोर बाप आँख मूंद लेलक, नय तऽ हम कब्बो ओकर सामना नय करे सकती” “तू बोले का चाहत हवे तोरा बड़ी दुख बा, आर तू जोन साँझ-फजिर हमर खून पियेले ओकर कोनों हिसाब नय हऽ।”
  
माँ की आँख भर आई थी। तभी बेटे ने घर में प्रवेश करते हुए दरवाज़ा बन्द करते ही माँ से कहा – “खयलऽ माँ?” माँ ने आँसू को रोकने का सफल प्रयास किया। माँ के सामने रखी थाली को देखकर ईश्वर पत्नी से बोला – “अभी ममा के                       भोजन देलऽ, तनी बोनेरे नय सकेलऽ पकावे, ममा एतना देरी खयन। ..... त एगो अंडा तार देतऽ।” पत्नी हिचकिचाई और चुप रही, माँ ने तुरंत जवाब दिया – “नय बेटो हमी मना करली।” बरतन उठाकर बहू ने माँ का हाथ वहीं धूला दिया।

दिन से माँ थोड़ी गुमसुम सी थी। बेटा और बहू भी खाने बैठे तो कुछ खास बात नहीं की, बस बीच-बीच में हू हू करती रही। ईश्वर ने माँ से एक दो बार हाल भी पूछा पर, माँ ने इतना ही कहा कि तबियत तो ठीक है बस मन ही नहीं लग रहा। ईश्वर खाकर उठा तो माँ ने सोने की इच्छा व्यक्त की। उसने हल्के से माँ को उठने में मदद की और धीरे-धीरे उसे कमड़े तक ले गया। दूध मँगवाकर उसने माँ को दिया। माँ ने जैसे तकिये पर सीर रखा फिर बीते दिनों की यादों में डूब गई।

केसरी जब दूसरी पत्नी के रूप में शादी करके आई तो ईश्वर पांच साल का था। पता नहीं क्यों पर उस बच्चे से कभी उसका लगाव न रहा। ईश्वर आस-पड़ोस में माँ की तारीफ़ का पूल बंधता रहता। नई माँ बहुत सुन्दर जो थी, तरह-तरह के पकवान भी पकाती थी। शुरू-शुरू में केसरी कभी-कभार उसके भोलेपन से मुग्ध हा जाती थी। लेकिन जब कुछ समय बाद पाता चला कि पड़ोस में रहने वाली पारो के साथ पति के मेल-मिलाप के कारण ही पहली पत्नी घर छोड़कर चली गई थी तो ईश्वर के प्रति भी उसका मन उदास होने लगा। जब किसी बात पर पति से कहा-सुनी हो जाती तो उनके घर से बाहर निकलते ही सारा गुस्सा ईश्वर पर बरस पड़ता। आस-पड़ोस में सौतेली माँ के चर्चे शुरू हो गए थे। ईश्वर भी अब माँ की तिरछी निगाहों से डरने लगा था। जब कभी कोई बच्चा उसे मारता तो दौड़कर माँ के पास आता, लेकिन माँ का चेहरा देखते ही सहम जाता।   

चार साल बाद जब केसरी ने बेटी को जन्म दिया तो जैसे उसका अस्तित्व ही बदल गया। बड़े ही प्यार से उसका नाम वीणा रखा। तब से सभी लोग उसे ‘वीणवाँ के माँ’ ही सम्बोधित करने लगे। कभी किसी ने ईश्वर की माँ नहीं कहा था, या शायद इसलिए भी कि उस टूअर बच्चे को उसने कभी बेटा समझा ही न था।

एक दिन जब केसरी किसी बात पर ईश्वर पर डंडों की बारिश कर रही थी तो देवरानी ने उसे रोकते हुए कहा था – “ देखिए वीणवाँ के माँ, ओकर लाठी में आवाज़ नय हऽ। टूअर लयका के तू एतना नय सताव, एक दिन बड़ी भारी भुगतान करबे।” “जान-बुझ के ई हमर लयका के गिरा देलक, देख ओकरा रो-रो के कैसन हाल होल बा। तोड़ लिए त हमी नय अच्छा हँय, हवे से न ओकर बाप के बोलले रहले कि हम दुःख देयला।”

देवरानी बिना कुछ कहे अपने घर में चली गयी थी। पहली जेठानी के घर छोड़ने पर वहीँ केसरी का रिश्ता लाई थी। दोनों बच्चपन से साथ बड़े हुए थे। शादी के तीन महीने बाद ही पति के दुर्घटना में मर जाने के बाद सास ने उसे घर से निकाल दिया था। विधवा सहेली की दुनिया फिर बस जाए और बेचारे ईश्वर को माँ का प्यार मिल जाए, इसी आशा में देवरानी ने रिश्ते की बात की थी। परन्तु ईश्वर के प्रति केसरी का व्यवहार देख देवरानी को अपने प्रस्ताव पर पश्यताप होने लगा था जिसका प्रायश्चित वह कभी- कभार ईश्वर को पेट भर भोजन करवा कर लेती थी ।

शादी की बात चली थी तो केसरी ने पूरे गाँव में कहा था – “हमर रहत त सूनत, गैर से उम्मीद रखली तऽ अपने जग-हसैया बनली, हम तऽ खाली हरदी धोवा देवब, बाकी अपन देखी। कोई नय सकी बोले न कि कथ-माँ के तनको चेत नय रहल बेटा के हरदी धोवायके। ” बेटा बिना माँ की मर्ज़ी काली दुलहन जो लाया था। शादी के कुछ साल बाद जब ईश्वर को बहू के खिलाफ़ माँ के दाव-पेंच की समझ हुई तो वह पहली माँ के घर रहने चला गया। उसके जाने के बाद तो केसरी ने छल से बूढ़े पिता की सारी जायदाद बेटी-दामाद के नाम करवा दिया।

बीमार पति को जब अस्पताल से देखकर लौट रही थी तो बस-स्टॉप पर ईश्वर वहाँ मिल गया था। उसके मन में डर समा गया था, कि मृत्यु लोक के द्वार पर खड़े बूढ़ा पिता कहीं सारी जायदाद बेटे के नाम न कर दे, वंश को चलाने के लिए उसने तीन पुत्रों को जन्म जो दिया था। केसरी ने झट जवाब दिया था – एगो मौसी के देखे अयली बेटा, पर ऊ त घरे चल गयलन।” अगली सुबह फिर अस्पताल पहुंचकर बीमार पति से बोली थी – “कोन बात के एतना घमण्ड, हाल पर हाल भेजली पर बाप के तनको चेत नय, तून्ही मरल जयऽ ओलोग पर, हमर नाती, हमर नाती।” शाम को केसरी दस्तावेजों पर अंगूठा लगवाने के लिए वकील को साथ ही लाई थी -“देखऽ आफत में के काम अवता, अब आव-ताव नय देखऽ। तोहर दामाद के मुँह देखऽ, ऊ नालायक के नय याद करऽ, ऊ तोहर कय्यो नय होय।” इतना कहते ही देवरानी को सामने पाकर केसरी सहम गई थी और इसके आगे कुछ नहीं कह पाई थी। देवरानी केसरी की सब चाल समझ चुकी थी पर अपने अधमरे जेठ को इतनी दयनीय अवस्था में देख कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पाई।   

जब ईश्वर को पिता की बीमारी की खबर पहुँची, तब पिता अपनी अंतिम घड़ियाँ गिन रहे थे। ईश्वर को पहली बार माँ का चेहरा देखकर घृणा का भाव हुआ था। माँ का सारा प्रपंच उसे समझ आने लगा था। इतना बड़ा झूठ, केवल उसे पिता से मिलाने से रोकने के लिए, क्यों? अनेकों प्रश्न उसके मन-मस्तिष्क को खाए जा रहा था। ईश्वर का हाथ थामकर बस बेटा शब्द निकला था और फिर पिता चीर शांति में मग्न हो चले थे। रोने धोने के बाद केसरी ने दबे आवाज़ में ईश्वर से कहा था - “सुन न बेटो, मरनिया तोर बहीन के घर से ही निकालब सऽ, पापा केतना दिन तऽ हौजे रहल, तुहूँ त जानले नऽ ओलोगे पर ओकर प्राण बसल रहे, अगवा त बड़का बाबू ही देय।” हाँ-हाँ के अलावा ईश्वर और कुछ ना कह पाया था। क्या कहता कि उसे पता चल गया है कि पिता के सम्पति से उसे कुछ नहीं मिलाने वाला, जो था सो बहन का हो चूका है । चाची ने पिता की बीमारी के साथ वकील की उपस्थिति तक की सारी बातें बता दी थी। “तू अपन हक के नय जाय देये, तोहरो तींगो बेटा बा, बड़ा होके कहाँ आसरा मिली ओलोग के, नाना के देवल ऊ ज़मीन बस नय होय, औरु तोहर लयका के हक बा ओलोगके के दादा के ज़मीन पर” ईश्वर ने यही कह कर बात टाल दी थी कि अगर पिता नहीं भी रहे तो माँ देगीं बच्चों को उनका हक।

आजीवन संघर्ष के बाद आज अवकाश प्राप्त कर ईश्वर अपने बच्चों और नाती-पोतों के बीच आराम की ज़िन्दगी बसर कर रहा था। गाँव में सभी से मेल-मिलाप और घर में अभी भी बाप का रुदबा था, भला और क्या चाहिए था। लेकिन कुछ दिन पहले माँ के आने से उसके चहरे पर एक अलग सी खूशी दिखाई पड़ रही थी। शायद इस लिए कि जिस ममता की कामना उसने बचपन से की थी उसकी आपूर्ति वह अब महसूस कर रहा था।

पति की मृत्यु के बाद केसरी बेटी-दामाद के घर रहने चली गयी थी। जब तक वह  घर और बच्चों को सम्भाल लेती थी घर में उसका मान रहा। उन दिनों केसरी  कभी अपने बहनों के घर चली भी जाती तो उसके लौटते ही वीणा कहती – “माँ नय रहेल त घरवा काटेला, बाबू त दिन भर नानी-नानी करत रहेला, अब नय जयऽ।” ये मधूर शब्द सुनकर केसरी मोहित हो जाती थी।
उम्र के ढलते ही शरीर भी ढलने लगा। तभी रोज़-रोज़ वीणा के नए रूप उभर कर उसके सामने आने लगे। एक दिन रसोई में बैठे सब्ज़ी काटती हुई केसरी वीणा से बोली – “ हय महीना पांस्यों के पैसवा मिली त ईश्वर लगे जाब, बड़का बाबू के शादी बा नऽ, ओके तीन हजार देले आप, जानी ओकर बाप नय बा तऽ कम-से-कम माँ तऽ अपन धरम निभयलक।” “ कोनों जरुरत नय बा, ओलोग के घट गल बा तऽ अपन दादी के आगे हाथ पसारियन सऽ, हमनी तऽ हमेसा से गैर हँय स।” केसरी हैरान रह गई थी कि दोपहर में भाई के सामने स्वयं वीणा ने कहा था “हमनी हँय स भया, तू काहे चिंता करले हवे ।”

केसरी को लगा था कि पति की पुश्तैने मकान में रहेगी तो शायद उनकी आत्मा को चैन मिलेगा इसीलिए उसने दामाद से वहाँ जाने का आग्रह किया था। अगली सुबह पति के काम पर जाते ही वीणा माँ पर बरस पड़ी। वीणा ने स्पष्ट शब्दों में माँ से कह दिया कि उस ज़मीन को बेचकर वह कारोबार में पैसे लगाएगी। उसने केवल निर्णय सुनाया था इसीलिए सलाह की आवश्यकता ही नहीं थी।

एक दिन ऐसे ही कहा-सुनी में वीणा ने कह दिया था कि पैसे उसके पिता का था जिसपर केवल उसी का हक था और माँ को किसी प्रकार के रोक-टोक का अधिकार ना था। केसरी ने मन ही मन सोचा था कि इस पैसे पर भाई का भी उतना अधीकार था जितना वीणा का था। पहली बार के लिए उसे आभास हुआ था कि उसने किसी के साथ अन्याय किया था, छल के किसी के सम्पति पर अपना अधिकार जमाया था, लेकिन वह अवाक रह गई थी।  

शायद लोगों के ताने से बचने के लिए वीणा माँ को बृद्धाश्रम न छोड़ सकी। जब केसरी में और अपमान का भार सहने की शक्ति न रही तो एक दिन बेटे को देखकर उसके साथ जाने की ज़ीद करने लगी। वीणा भाई के सामने कुछ कह भी न पाई और माँ एक दिन रुकने की याचना कर दो ही कपड़ों में वहाँ से निकल पड़ी। पीछले दस सालों में क्या क्या नहीं देखा था। शुरुआत में तो रहा था सब कुशलता से चल रहा था, परन्तु पिछली बार बीमारी के बाद जैसे शारीर की सारी शक्ति लुप्त हो चली थी।  ईश्वर का हाथ पकडे जब केसरी घर से निकल रही थी तो मानो वह जेल से आज़ाद हो रही थी।

तीन हफ़्ते बीत गए थे लेकिन आज भी बेटे-बहू, यहाँ तक कि नाती-पोतों के शब्दों में पहले दिन के जैसी मिठास थी। माँ अब इस मिठास और सम्मान का बोझ उठा नहीं पा रही थी। आजीवन जिनका तिरस्कार किया, आज उन्हीं से आश्रय और सम्मान पा रही थी। उसे बार बार ये अहसास होता कि वह इस प्यार का हकदार न थी।

दिन में उसकी देवरानी मिलने आई थी। आते ही उसने पूछा था - “वीणवाँ के माँ” कैसे बा हा-चाल?” मन में एक टीस सी हुई थी। उसने सोचा कि मूह पर बोल दे कि वह तो ईश्वर की माँ है। लेकिन देवरानी को किस मुँह से वह ऐसा कहती। “हमरा बड़ी माया लगता तोहरा देख के, देख आज कोन हाल होता तोर, कोन करनी करले बीणवाँ के मो, अभी तोर दसा देख, घर-बार बेचके केकर आसरा में हवे।” केसरी अपने आखों से आँसुओं के बहते धारा को रोक न पाई थी। “ अब जिए के इच्छा नय बा बिस्वानी, हम कोन मुह लेके जियब, बोल अपन भया के हमरा बला लेय, अब ई बोझ नय सहल जाता, हम ईश्वरवा के नय सकीला आँख में देखे, बड़ी माया लागेला गे लयक्वा पर, कय्यो कोनों ओरहन नय देवेला, औरु जे के मिलल तऽ ओके बस वे नय होल ।”

देवरानी के जाने के बाद, वह खुद मन ही मन आग्रह करने लगी कि जीवन के इस अंतिम पड़ाव में आ खड़ी हुई है, कम से कम अभी भी तो कोई उसे “ईश्वर की माँ” कह दे। जिसे अपना पूरा जीवन सौंप दिया, जिस पर अपना सारा प्यार, सारी ममता न्यौछावर कर दी, जाते-जाते तो उसका बूरा नहीं सोच सकती थी। पर जिस सौतेले संतान का उसने सब कुछ छीन लिया था, जिसे आजीवन कोसती रही थी, कम से कम उसे एक बार हृदय से लगाकर आशीर्वाद देना ही उसकी प्रबल अभिलाशा रह गई थी।

देवरानी के वाक्य अभी भी उसके कानों में गूंज रही थी और आँखों से आँसू रुक ही नहीं पा रहे थे। सुबह वीणा ने फोन किया था और भाई से कहा था कि दो-एक दिन में वह माँ को लेने आएगी। यह सुन केसरी मन ही मन उदास हो गई थी।

तभी बहू कमरे में आई, बगल की मेंज़ से गिलास उठाकर उसने माँ से पूछा – “माँ चिरागवा बूता देय।” माँ के मुँह से सिर्फ़ “हूँ” निकला। और पूरे कमरे में अँधेरा छा गया।

ऋषि झब्बु








ज़िंदगी और ब्लोग

ज़िंदगी तू ने की दुश्मनी
जन्म लेते ही हुआ बेसहारा
अपना होते हुए भी रहा अकेला
आज कमाल हो गया
ब्लोग से अवगत होना
लगा संसार मेरा हुआ
जिंदगी तू ने की दुश्मनी
क्यों इतनी देर लगा दी
कराने मे ब्लोग से दोस्ती
जय हो विश्व हिंदी सचिवालय
जय हो ललित जी, पूर्णिमाजी, बालेंदु जी
                


हम थे यही सोचे कि हिंदी पढ़ ली
लिख ली हिंदी और जान ली
अब पता चला सीखा क्या खाक
जब माथे पर लगी नहीं टेकनॉलॉजी की राख

ज़रा बता कम्प्यूटर तू है कैसी बला
तुझ को जानना भी है अद्भुत कला
तुझे क्या कहूँ तू है पत्नी से भी बड़ी समस्या
समझ में नहीं आता तू है विज्ञान या माया
दुनिया पर छाई तो बन अजीब बला
लगता वार तुम्हारा जैसे निशाने पे भाला
फिर भी प्यार तुमसे करता जग सारा
करूँ क्या... मूझे भी पीनी है तुम्हारी हाला
ज़रा बता कम्प्यूटर तू है कैसी बला