शनिवार, 2 जून 2012

मैं


हम सब एक हैं

बस की ‘कयू’ में

मेखाने के द्वार पर

हम सब एक हैं



रंग तो लाल सभी के

पसीने भी नमकीन

वही जल

वही वायु

दो हाथ

दो पैर







कहने को तो

नैन-नक्ष एक हैं

देखने में, सभी हैं एक सा,



लेकिन...

हम सब एक हैं



नहीं?

सत्य वचन नहीं मैं बोलता?

एक नहीं हैं हम?



हम हैं एक क्योंकि मैं हूँ बोलता

क्योंकि अब नहीं मैं, अकेला द्वीप

साधन है मेरा अनेक,

मंच है मेरा, जनता मेरी

इस लिए मैं फिर से कहता

एक हैं हम,

हम सब एक हैं


(आधे-अधूरे विचारों का एक सा‍ंचा प्रस्तुत है.)

लेखक: अरविंदसिंह

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