रविवार, 10 जून 2012

पाखाना


मैं ने सोचा

मैं ने बहुत सोचा

उत्तर क्या होगा

कारण क्या होगा

जगह कौन सी होगी

त्रितीय विश्व युद्ध् का



मैं बोला ‘औरत’

तो दोस्तों से

गुरू से मार खाई



अर्थशास्त्रियों ने कारण पानी बताया

तो लगा कि बात में दम होगा

पर खून जब न खौला पड़ोसियों को गाड़ी धोते देख

न तब भी जब बढ़ गई तपती धूप में मेरी प्यास

‘जेब में था पैसा, बिसलरी पानी, कोक आदि’

तो जि‍ज्ञासा न बुझी



पर एक दिन पाखाने मएं बैठा जब हलके होने

हलके होकर जब नल खोला

और नल खोलके

निन्यानबे प्रतिशत से भरे जलाशय से

जब पानी न आया

तो कर दी सब की माँ बहन एक



तब ज्ञान आया,

सोच से नहीं, वरन अनुभव से,

हर कब, क्यों और कहा‍ँ  का

‘पाखाना’



लेखक : अरविंद्सिंह

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