ज़िंदगी और ब्लोग
ज़िंदगी तू ने की दुश्मनी
जन्म लेते ही हुआ बेसहारा
अपना होते हुए भी रहा
अकेला
आज कमाल हो गया
ब्लोग से अवगत होना
लगा संसार मेरा हुआ
जिंदगी तू ने की दुश्मनी
क्यों इतनी देर लगा दी
कराने मे ब्लोग से दोस्ती
जय
हो विश्व हिंदी सचिवालय
जय
हो ललित जी, पूर्णिमाजी, बालेंदु जी
हम थे यही सोचे कि हिंदी पढ़ ली
लिख ली हिंदी और जान ली
अब पता चला सीखा क्या खाक
जब माथे पर लगी नहीं टेकनॉलॉजी की
राख
ज़रा बता कम्प्यूटर तू है कैसी बला
तुझ को जानना भी है अद्भुत कला
तुझे क्या कहूँ तू है पत्नी से भी
बड़ी समस्या
समझ में नहीं आता तू है विज्ञान या
माया
दुनिया पर छाई तो बन अजीब बला
लगता वार तुम्हारा जैसे निशाने पे भाला
फिर भी प्यार तुमसे करता जग सारा
करूँ क्या... मूझे भी पीनी है
तुम्हारी हाला
ज़रा बता कम्प्यूटर तू है कैसी बला
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