दस रुपए में बिकता हूँ रोज़
और खो देता हूँ ये भी मोल
पढे लिखे शिक्षित लोगों के हाथों में
रोता हूँ बार बार
शर्मनाक खबरों से बनी
अपनी अस्मिता पर
कभी लिख दिया जाता है मुझपर
ह्ज़ारों लोगों के पसीने को पीकर
घूमता है कोई बड़ी बड़ी गाड़ियों में
फिरभी कहता है मेरी प्यास नहीं बुझी
मुझे तुम्हारा खून भी चहिए
एक कायर सी लौ जगती है लोगों में
जो शीघ्र ही बुझ जाती है
अंधेरे के डर से
मेरी बिकरी बढ़ जाती है जब
बलात्कार को संसनी खेज़ बनाकर
मेरा विज्ञापन किया जाता है
और ढिंढोरा पीटता हूँ मैं
किसी की तबाही का
दस रुपए में
और फिर
वही कायर सी लौ
बेईमानी, चोरी, भ्रष्टचार,
बच्चों पर ज़ुल्म, स्त्रियों पर अत्याचार,
नेताओं के ढकोसले
बयान करता हूँ रोज़
चिल्ला- चिल्लाकर
और फिर
वही कायर सा लौ
इस जलने बुझने तक ही
सीमित रह गई
परिभाषा मेरी
फिरभी तसल्ली दे देता हूँ खुदको
कि आज का इनसान भी
मेरी तरह जीता है
पर न जाने क्यूँ
न जाने क्यूँ
इनसानों सा जीना
मुझे अब तक रास नहीं आता
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बहुत बढ़िया वशिष्ठ !! अपने अन्देर की इस आग को बुझने न देना ..यही तुम्हेँ विशिष्ठ बनायेगी..
जवाब देंहटाएंकुमुदिनी
खुशी है कि आपको कविता अच्छी लगी. सादर धन्यवाद
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