गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

वशिष्ठ कुमार झमन

मैं अखबार हूँ
दस रुपए में बिकता हूँ रोज़
और खो देता हूँ ये भी मोल
पढे‌ लिखे शिक्षित लोगों के हाथों में
रोता हूँ बार बार
शर्मनाक खबरों से बनी
अपनी अस्मिता पर

कभी लिख दिया जाता है मुझपर
ह्ज़ारों लोगों के पसीने को पीकर
घूमता है कोई बड़ी बड़ी गाड़ियों में
फिरभी कहता है मेरी प्यास नहीं बुझी
मुझे तुम्हारा खून भी चहिए
एक कायर सी लौ जगती है लोगों में
जो शीघ्र ही बुझ जाती है
अंधेरे के डर से

मेरी बिकरी बढ़ जाती है जब
बलात्कार को संसनी खेज़ बनाकर
मेरा विज्ञापन किया जाता है
और ढिंढोरा पीटता हूँ मैं
किसी की तबाही का
दस रुपए में
और फिर
वही कायर सी लौ

बेईमानी, चोरी, भ्रष्टचार,
बच्चों पर ज़ुल्म, स्त्रियों पर अत्याचार,
नेताओं के ढकोसले
बयान करता हूँ रोज़
चिल्ला- चिल्लाकर
और फिर
वही कायर सा लौ

इस जलने बुझने तक ही
सीमित रह गई
परिभाषा मेरी
फिरभी तसल्ली दे देता हूँ खुदको
कि आज का इनसान भी
मेरी तरह जीता है
पर न जाने क्यूँ
न जाने क्यूँ
इनसानों सा जीना
मुझे अब तक रास नहीं आता

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया वशिष्ठ !! अपने अन्देर की इस आग को बुझने न देना ..यही तुम्हेँ विशिष्ठ बनायेगी..
    कुमुदिनी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. खुशी है कि आपको कविता अच्छी लगी. सादर धन्यवाद

      हटाएं