गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

अंजली हजगैबी


                      जीवन की गगरी

जीवन की गगरी में
लाखों स्वप्नों के बोझ को
छाती पर लादे
एक-एक करके विसर्जित कर देना पड़ता उन्हें
कमियों के सागर में
अजगर सी ज़रूरतें निगल लेती
                इन कोमल स्वप्नों को।

रोज़मर्रा के जीवन में
कमियां जब आदतें बन जाती है
तो ज़रूरतों का महत्व भी नहीं रहता
कमियों के संसार में
जीवित रह पाना ही बड़ी बात है।

बिना मक्खन की सूखी रोटी
गले को ज़ख्मी करते हुए,
काली चाय की कड़ुआहट
सीने को ऎंठती हुई..
पेट तक का रास्ता ढूंढ ही लेती।
शाम ढलते ही मज़दूरी करके
मां जब निराशा को झोली में संजोए
घर लौट आती
तो पेट की आग समझौता कर लेती
गीली भात,
उबले कच्चे पपीते की फीकी तरकारी से।

मार्केट में सबसे महेंगी चीज़ को देखते हुए
सबसे सस्ती चीज़ खरीद लाना...
खुद को समझा लेना पड़ता कि
चीज़ें महेंगी हो गई है
आदमी का जीवन सस्ता...

हाथ में हलका बटुआ लिए
इच्छाओं की मण्डी में घूमकर
अपना ही उपहास कर लेती कभी-कभार

अठन्नी-एक रुपया जोड़
एक जेब में उसकी खनक
तो दूसरी जेब में मायूसी की शान्त चीख ढोते हुए
स्कूल से युनिवर्सिटी तक का सफ़र तो काट लिया।
पर लक्ष्य के बस स्टाप पर उतरते ही
पता चला कि मंजिल के भी पैर निकल आए।

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