"एक बच्चे को"
आज,
न चाहकर भी देख
आया मैं,
स्कूल से लौटते
हुए एक बच्चे को,
फटे उसके गंदे
जूतों को,
पुराने कमीज़ के
असाधारण रंग-बिरंगे बटनों को,
पतलून के ज़िप पर
लगे पिन को,
मैले रंगहीन बसते
को,
देख आया मैं|
आँखों में उसके
देखा,
एक ओर थकान था,
तो दूसरी ओर
ख़ुशी,
एक ओर व्यस्तता
थी,
तो दूसरी ओर
शांति,
एक ओर दारिद्रता थी,
तो दूसरी ओर
पूर्ती|
तब एकाएक,
दिल से दुआएँ
निकलीं,
प्रार्थनाएँ
निकलीं,
दुःख हुआ,
पर ख़ुशी भी मिली|
कि अच्छा है-
संघर्ष है,
सपने हैं,
आशाएँ हैं...
मंजिल भी मिल
जाएगी|
पर, हे प्रभु
इन छोटी-छोटी
मासूम आँखों को,
धोखा मत देना|
देर ही सही,
इन नन्हे पैरों
को,
अपनी मंजिल तक
पंहुचा देना|
लेकिन,
इतना भी सहायक न
बन जाना,
कि, ये ही पद,
एक दिन,
दूसरों को कुचल
कर आगे बढ़ जाए|
इसलिए,
इन्हें नियंत्रित
रखना,
मार्ग दिखाना,
ठोकर देना,
आँचल भी देना|
आज,
न चाहकर भी,
देख आया मैं,
स्कूल से लौटते
हुए एक बच्चे को|
जीष्णु
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