गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

जीष्णु हरिशरण


                "एक बच्चे को"

आज,
न चाहकर भी देख आया मैं,
स्कूल से लौटते हुए एक बच्चे को,
फटे उसके गंदे जूतों को,
पुराने कमीज़ के असाधारण रंग-बिरंगे बटनों को,
पतलून के ज़िप पर लगे पिन को,
मैले रंगहीन बसते को,
देख आया मैं|
आँखों में उसके देखा,
एक ओर थकान था,
तो दूसरी ओर ख़ुशी,
एक ओर व्यस्तता थी,
तो दूसरी ओर शांति,
एक ओर दारिद्रता थी,
तो दूसरी ओर पूर्ती|
तब एकाएक,
दिल से दुआएँ निकलीं,
प्रार्थनाएँ निकलीं,
दुःख हुआ, पर ख़ुशी भी मिली|
कि अच्छा है-
संघर्ष है,
सपने हैं,
आशाएँ हैं...
मंजिल भी मिल जाएगी|
पर, हे प्रभु
इन छोटी-छोटी मासूम आँखों को,
धोखा मत देना|
देर ही सही,
इन नन्हे पैरों को,
अपनी मंजिल तक पंहुचा देना|
लेकिन,
इतना भी सहायक न बन जाना,
कि, ये ही पद,
एक दिन,
दूसरों को कुचल कर आगे बढ़ जाए|
इसलिए,
इन्हें नियंत्रित रखना,
मार्ग दिखाना,
ठोकर देना,
आँचल भी देना|
आज,
न चाहकर भी,
देख आया मैं,
स्कूल से लौटते हुए एक बच्चे को|

जीष्णु














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