गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

गुल्शन सुखलाल




पासवर्ड

सुबह जब जागा
  तो मोबाईल को चार्ज पर से निकाला और
   ऑन करने के लिए कोड डाला
    तैयार होकर ऑफिस पहुँचा
     वहाँ दर्वाज़े का कोड डालकर लाल बत्ति हरी की
      फिर कम्प्यूटर ने मांगा अपना पासवर्ड
       और जब पैसे निकालने ए.टी.एम तक पहुँचा
        तो एक और…
                 कोड...
दिन भर के कामों को अनलॉक करता हुआ
  जब शाम को घर पहुँचा
   तो सीधे बिस्तर पर क्रैश हो गया
    पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदार तो एंटर कर नहीं पाए
     बीवी, बच्चों, माता पिता को भी मेरी दुनिया में
      एक्सैस मिला नहीं...

ज़िन्दगी में बेमानी हो चली
  कुछ भावनाओं, नर्मियों को
   दिल के जिस फोलडर में रखा था
    उसका पासवर्ड...
     मैं कहीं भूल गया।



गुलशन
07/06/07 

1 टिप्पणी:

  1. “ बैक अप रखिये महाशय” ... और भूलने की आदत सुधारिये... चलिये यह तो हुई कुछ हल्की फुल्की बात पर सच तो यह है कि “ पास वर्ड” तो दूर की बात है जनाब लोग तो यह भी भूल जाते हैँ कि उन्होँने कोमल भावनाओँ और नर्मियोँ की कोई फाइल भी कभी बनायी थी... उम्मीद है कम से कम तुम यह कभी नहीँ भूलोगे ...
    इसी आशा मेँ,
    कुमुदिनी

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